शून्य स्थान(collective performance )2015

Hindi poet Gajanand Madhav Muktibodh his one of longest poem ” Into the Darkness” (Andhere me ) which is his replantation of his time as I feel this poem has representaion of our time a a well .

Where different social political scene is in dark age . Cast ,religion and economic political and social paradoxical situation making it as Hollow Feeing to me , where the poetry  making mark on my mind .

Therefore , my basic  idea of performance is to make cause through the normal action which is I realized as photographer and intermedia artist to understand the situation of opeing how peoples  are active participant of the performanace , so I ask my friends to be a part of this performance where Harish is as a writer poet and thretore artist ,Seema is photographer and Independent filmmaker as well as Ankita is filmmaker to respond the situation and make the action whatever is normal action needed for document the inogratio of a show ,

Hardik and amul is Classical Hindustani musicians there practice is totally different but for me crating the sound bialmbit taal and in the such ecochestic place it making kind of noise .

My part is not present in the performance I am reading poetry from other side of exhibition hall so audience had experience of my voice which is on and off .

 

 

My search is about the existence of life and death.I am interrogating the existential question in virtual as well as in the real world.I am using the different tools and mediums of visual art to explore the possibilities of the subject. I have been exploring ‘THE YOGA VASHISTA’ for many years.It’s a kind of description of dialect. It’s representation of being, is supposed to be the mirror of the super consciousness and parallel entity.These philosophical enquiries led me to my space and image explorations.  Even we are exploring the quantum machine, black hole existence and where we are now in this cosmos.Our human existence allows us to find out the point of big bang and the mystery of extreme darkness is still unsolved.

These both paradoxes are very similar to enigma of existence. We don’t know where we are. We are just witness of space in time axis which is called Dwandatmak(enigmatic). This complete situation is the ‘lied paradox’.

My complete series is based on the witness of people and time

Collaboration with WriterK Harish Singh,

filmmaker Seema Dahiya And Ankita Sharma

Clasical Musician –

Tabla- Amul jha

Sitar – Hardik Verma

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1)अंधेरे में / भाग 1 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 2 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 3 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 4 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 5 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 6 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 7 / गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधेरे में / भाग 8 / गजानन माधव मुक्तिबोध

ज़िन्दगी के…
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किन्तु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है–वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह–
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?

बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब…
अँधेरा सब ओर,
निस्तब्ध जल,
पर, भीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुसकाता है,
पहचान बताता है,
किन्तु, मैं हतप्रभ,
नहीं वह समझ में आता।

अरे ! अरे !!
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक
वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर
चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात्–
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक
तिलस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड़ से
……………………
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी
अन्तराल-विवर के तम में
लाल-लाल कुहरा,
कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक,
रहस्य साक्षात् !!

तेजो प्रभामय उसका ललाट देख
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख
सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्
गहन एक संदेह।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा।
प्रश्न थे गम्भीर, शायद ख़तरनाक भी,
इसी लिए बाहर के गुंजान
जंगलों से आती हुई हवा ने
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी-
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर
मौत की सज़ा दी !

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही
आँखों में बँध गयी,
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया,
किसी शून्य बिन्दु के अँधियारे खड्डे में
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !….

 

Film bySeema Dahiya

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