visual art

कोहबर

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कोहबर बिहार,झारखंड और उत्तर प्रदेशमें भित्ति चित्र परंपरा का प्राचीनतम उदाहरण है। जो वैवाहिक उत्सव में बनायी जाने वाली लोक कला एवं  सांस्कृतिक परंपरा का उदाहरण है।

यह विवाह के उपरांत औरतों द्वारा वनाया जाता हैं । विवाह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण संस्कार है । जो जन्म से मृत्यु तक के महत्वपुर्ण  संस्कारो मे आता हैं ।

विवाह गृहस्थ जीवन प्रारंम्भीक बिंदु हैं जो समाजीक, सांस्कृतिक, धार्मिक कार्य कलापों का आधार भी है अतः शादी  में दो महत्वपूर्ण अंग होते हैं वेदाचार और लोकाचार , कोहबर लोकाचार परंम्परा के तहत आता है जिसमे औंरतो का महत्व पूर्ण योगदान होता हैं । कोहबर इसी लोकाचार का हिस्सा हैं जिसमें प्रचलीत लोक रिवाजों के आधार पर विभिन्न अनुस्सठान निभाय जाते हैं । अतः कोहबर विभिन्न लोकाचार परम्मपरा का शादी में होने विधान है जो प्रारम्परीक और स्थानीय  मतानुसार विभन्न स्थानो पर सांस्कृत महत्व के अनुरूप  होता हैं ।

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कोहबर का शाब्दिक अर्थ होता है वर का निवास स्थान । कोह – गुफा या कमरा , एवं वर- दुल्लहन का निवास स्थान । यह शब्द गुहा चित्र से संम्बंधित है जो मिर्जापुर(उ . प्र, ),विन्घयान (म.प्र.),झारखण्ड और बिहार से हैं ।

इस शब्द को संस्कृत भाषा के शब्द कोष्ठवर का अपभ्रंस रूप कोहवर भी  माना जाता हैं ।अतः इस शब्द का शाब्दीक अर्थ वह कमरा जाहा वर –वधु पहली रात व्यतीकत करते हैं  दुल्हन का कमरा यह परम्मपरा एक आदि।

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ऐतिहासीक पृष्टभूमि-

कोहबर बास्तविक रुप से भित्तचित्र और शिला चित्र परम्मपरा का रूप है, जो 30000 -10000 ई. सा. पूर्व  का हैं।  मिर्जापुर मे यह पाषाण युग से और हजारीबाग(झारखण्ड ) में   यह शौली कास्य युगीन भित्तचित्र जो सति-महादेव(माहुड़ी) सतपहाड़ श्रृखला दामोदर पर्वत श्रृखला में जो भित्तिचित्र मिला हैं , वही चित्र श्रृखला पारंम्मपरीक रूप में गोधन, सोहराई और कोहबर के रूप मे विघ्मान है। मिथिला मे भी यह परम्मपरा पाषाण युगीन हैं माना जाता है ।

पारंम्मपरीक शौलीगत विशेषता और महत्व –  कोहबर की परम्मपरा 30000-10,000 वर्ष पुरानी मानी जाती हैं । कोहबर चित्र बनाने की कोई विशेष चित्रातमक शैली नही हैं, यह लोक परम्मपरा पर आधारीत वैवाहिक अनुष्ठान हैं ।  जो कि मुलतः  क्षेत्रीय विशेषता और रीति-रिवाज़ है, जो  आदिवासी या लोक परम्मपरा मानी जाती है, यह पाषाण युगीन सभ्यता से  अब तक चली आरही  परीपाठी हैं। जो कि विभिन्न हिन्दु अनुष्ठानों के रुप मे विध्मान हैं। यह अनुष्ठानीक शैली है जो हिन्दु विवाह में एक विधि रुप में स्थापित रिवाज़ है।

इसकि विशेषता कस्य युगीन मंडला चित्रों के अनुरुप है जिसमें ज्यामितिय आकार ,लता,पुष्प ,पौधें ,बड़े जानवर , पक्षीयों ,किड़े-मकोड़े , हल, ओखल-मुशवल आदि घरेलू बस्तुऔ  के अलावा हाथ और पैरो के छाप ,देवी-देवता और कुल देवता आदि का युगल चित्रांकन होता हैं ।

वस्तुतः यह प्रक्रिया वर-वधू के पहली रात वाले निवास स्थान पर बनाये जाने वाली चित्र अनुष्ठान है जो घर की स्त्रियों द्वारा चित्रों का अंकन और विभिन्न वैवाहिक प्रक्रिया के दौरान संगीत के जरीये दांपत्य जीवन और सामाजिक जिम्मेदारी को सांकेतिक अंकन और गायन का प्रस्तुती करण है।

इस में जो चित्र बनते है उसका संबंध वर-वधू केलिए एक संकेत होता है इस में उन वस्तुओं का अंकन होता हैं जिससे दम्मपति के उन्नती,प्रजन्न,उरवरता और वंश वृध्दि को बढ़ावा मिलें । साथ मे गानो ,कहानीयों और चित्रो के जरीय स्त्री-पुरुष के व्यक्तिगत संबंध,जीवन मूल्यों एवं अपने देवी-देवता तथा पूर्वजों का वर्णन होता हैं ।

इन स्थान पर जो चित्र बने होते है उन चित्रों का सान्केतिक अर्थ होता है । जिसकी व्याख्या नही हूई हैं । इन चित्रों मे बनने बाले वस्तु  इस प्रकार है , हाथी , शेर,तोता,साप, गर्भवती मछलीयाँ, मोर,बास का पेड़, पुष्प लता , हल, ओखल-मूशल, वर्तन, शिव-पारवती,विष्णु-लक्ष्मी, कुल देवता ,अष्टदल कमल ,खीला हुआ कमल, मंडला यंत्र, तथा स्त्रि-पुरूष के जनन अंग आदि कई सांकेतिक चिन्ह होते हैं। तथा इन अंकित चित्रों को गाने, हंसी-मजाक के जरिए इनका संबंध स्थापित करते हैं

अतः इन सब प्रकरण मे कोहबर चित्र कला भारतीय भित्ति चित्र परम्परा का एक अनुठा एंव आदिम संस्कृति का रूपांतरण है।

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शैलीगत विशेषता-

कोहबर एक चित्रात्मक सांकेतिक पारंपरिक लोक रिवाज़ है जो विवाह मे बनाया जाता है यह लोककला है जो अपनी क्षेत्रीय विशेषता को लिय हुए है ।कोहबर चित्र पर अलग-अलग क्षेत्रीय कला शैली का प्रभाव दिखता है । जैसे झारखंड मे हजारीबाग मे मिले गुफा चित्रो का प्रभाब वहां के कोहबर पर दिखता है। इन मे जादुपटीया और सोहराई लोक शैली प्रमुख है।

मिर्जापुर मे मीले भित्ति चित्र का प्रभाव भोजपुर की चित्रकला शैली पर दिखता है। जिसे भोजपुर शैली के नाम से जानते है। बिहार मे भी यह शैली गत रुप से कई भागो मे बटा है,

1)- मिथिला चित्रकला

2)-भोजपुर चित्रकला

3)-मंजूषा चित्रकला

इस प्रकार इन शैली मे होने वाले रूपक ,आकार और संकेतो अध्ययन और दस्तावेजीकरण करना आवश्यक है।

समकालीन समय-  यह परंपरा जीवन की आपा-धापी और  शादियों के व्यवसायीकरण से प्रभावित हो रही है।  कई तरह के  पारंपरिक अनुष्ठान प्रतिस्थापित हो रहे हैं  और कई को महत्व नहीं दिया जाता या फिर उसे संक्षेप मे जल्दी खत्म करते है। नयी पीढ़ी इन अनुष्ठानो को नही समझ पाने के कारण इन सब को आडंबर और रूड़ीवादीता समझते है । इन कारणों से इसको महत्व नहीं देते है ।

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