कवि और कवितायें

अपनी भाषा के बिना ,मै मुंक रहा, लेकीन कुछ दिनों मे हिन्दीं टाईपिंग ना जानने के कारण अपनी अभिव्यक्ति ना मैं अंग्रेजी पूर्णतः कर पा रहा था ऩा हीं हिन्दीं में, दोनो ही कठिन था, आज अमित ने

मुझे टाईपिंग सिखाया , इसलिए अनायस ही कुछ लिखने का मन हुआ । यह अभ्यास भी हैं और मुझे जो कवि या कविता अच्छे लगते हैं उन कवितऔं को मैं आपसे बाट रहा हूँ ।

और एक महत्वपूर्ण बात हैं कि हिन्दी मे आँनलाईन पढ़नें की सामग्री कम उपलब्ध हैं ।

यह कविता अज्ञेय कि कविता संग्रह सन्नाटे का छन्द से है 

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 (फोटोः- मन्डि -हाउस का रूपान्तरन)

सन्नाटे का छन्द

अज्ञेय

आज थका हिय – हारिल मेरा

इस सूखी दुनिया मे प्रियतम मुझ को और कहॉ रस होगा

शुभे तुम्हारी स्मृति के सुख से प्लावित मेरा मानस होगा ।

दृढ़ डैनों के मार थपेड़े अखिल व्योम को वश में करता .

तुझे देखने की आशा से  अपने प्राणो में बल भरता,

ऊषा से ही उड़ता आया. परन मिल सकी तेरी झाँकी

साँझ समय थक चला  विकल मेरे प्राणो का हारिल –पाखीः

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तृषित , श्रान्त , तम-भ्रान्त और निर्मम झंझा-झोकों से ताड़ित —

दरस प्यास है असह , वही पर किये हुऐ उस को अनुप्राणित ।

गा उठते हैं ,आऔ आऔ । केकी प्रिय घन को पुकार कर

स्वागत की उत्कंठा मे वे हो उठते उद्ब्रान्त नृत्य पर ।

चातक- तापस तरु पर बैठा स्वाति- बूंद मे ध्यान रमाय,

स्वप्न तृप्ति का देखा करता ,पी। पी। पी। की टेर लगाये।

हारील को सह्रा नही हैं – वह पौरुष का मदमाता हैः

इस जड़ धरती को  ठुकरा कर उषा-समय उड़ जाता है।

बैठो, रहो ,पुकारो गाओ , मेरा वैसा धर्म नहीं है ,

मैं हरिल हूँ , बैठे रहना मेरे कुल का कर्म नहीं हैं .।

तुम प्रिय की अनुकम्प्पा माँगो, मैं माँगूँ अपना समकक्षी

साथ-साथ उड़ सकने वाला एक मात्र वह कंचन-पक्षी ।

यों कहता उड़ जाता हारिल ले कर निज भुज-बल का सम्बल

किन्तु अन्त सन्ध्या आती है – आखिर भुज-बल है कितना बल ।

कोई गाता, किन्तु सदा मिट्टी से बँधा-बँधा रहता हैं,

चातक हैं, केकी हैं, सन्ध्या को निराश हो सो जाता है,

हारिल हैं – उड़ते –उड़ते ही अन्त गगन में खो जाता हैं ।

कोई प्यासा मर जाता हैं कोई प्यासा जी लेता हैं

कोई परे मरण जीवन से कडुवा प्रत्यय पी लेता हैं,

आज प्राण मेरे प्यासे हैं, आज थका हिय- हारिल मेरा

आज अकेले ही उस को इस अँधीयारी सन्ध्या ने घेरा ।

मुझे उतरना नही भूमि पर तब इस सूने में खोऊँगा

धर्म नही हैं मेरे कूल का –थक कर भी मैं क्यों रोऊँगा

पर प्रिय । अन्त समय में  क्या तुम मुझे दिलासा दोगे –

जिस सूने में मैं लूट चला , काही उसी में तुम भी होगें ।

इस सुखी दुनिया में प्रियतम मुझ को और कहाँ रस होगा ।

शुभे । तुम्हारी स्मृति के सुख से प्लावित मेरा मानस होगा ।

 

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